खबरे ख़ास हो...खबरें आम हो...और ख़बरे उन ख़बरनवीसों की हो तो दुकान सज गयी है...संसद के भीतर और संसद के बाहर भी...संसद के भीतर सजायी है...देश के कोने कोने से आये राजनीति करने वालों ने...और बाहर जिनकी दुकान लगी है वो उन लोगों की है जो ख़बरे दिखाते है...खबरे बनाते है और खुद कभी कभी ख़बर बन जाते है...रोज जाता हूं...इस चौक के रंग में रंगने की कोशिशे भी करता है...
Wednesday, 3 August 2011
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