प्रकाश पीयूष

प्रकाश पीयूष

हमारी सोच

Tuesday, 28 December 2010

जब छोटा था...तो राजनीति से नफरत थी...बड़ा हुआ रोजी रोटी का तलाश हुआ...जिन्दगी ने कई मोड़ दिखाये...तब के मेरे गुरू स्व। मनीष कुमार ने कहा था...जिस धंधे को तुम अपना कैरियर बना रहे हो उस धंधे के धंदेबाजों से पार पाना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा...तुम काम करोगे...करते जाओगे...मुंह बंद रखोगे...तुम्हारे मुंह में बाते डाल दी जायेगी...आज तुम्हारा वक्त है...कल का वक्त तुम्हारा नहीं होगा...भारी झंझावतों को पार करता पत्रकारिता के १५ साल पूरे कर लिए...यादे आयी चली गयी जो शेष रह गयी वो उन धंधेबाजों के साथ की रह गयी जो अपने लिए अपने आप के लिए किसी की जान ले सकते है...किसी कि रोटी पर हमला कर सकते है...
मिडिया...जहां दूसरों को रास्ता दिखाया जाता...दूसरों को अच्छे होने की नसीहत दि जाती...अगर यहां काम होता तो शायद आज के बदले समाज में हम कहीं और होते...वक्त बदला तो समाज बदला...समाज बदला तो राष्ट्र में क्रांति आयी...सूचना तकनीकि का जमाना आया...दुनियां कहां से कहां पहुंच गयी...लेकिन जिस कवि(पत्रकार) की कल्पना दिनकर ने की थी वो कवि रवि तक तो नहीं पहुंच पाया हां...गंदे फसल की ऐसी फेहरिस्त पैदा कर दी जिसका फसल आज हम काट रहे है...और आने वाली पीढ़ी भी काटेगी....हम राजनीति भी सिखने लगे है...लेकिन हमारे धंधे के धंधेबाजों ने राजनीति का नाम बदल दिया...पोलिटिक्स से डेपलोमेसी कर दिया...
हमारी सोच और हमारा लेख उन लोगों को समर्पित है जो मिडिया के दफ्तर में नेताओं पर गाली निकालते और खुद उस समाज को अपने बहसीपन का निशाना बनाते जो दिन रात उनके साथ रहता है...इनसे तो ये नेता अच्छे जो राजनीति करते खुल कर करते...अपने विरोधियों पर निशाना साधते लेकिन नाम नहीं छिपाते जो करते वो आमने सामने करते....

प्रकाश पीयूष

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