प्रकाश पीयूष

प्रकाश पीयूष

हमारी सोच

Thursday, 7 July 2011

कौवा....कौवा का मांस खाता है..........


कौवा...कौवा का मांस खाता है...ये कहावत जरूर है लेकिन सच सौ फिसदी है...एक बार अमर सिंह ने कहा था...तो यकिन नहीं हुआ...लेकिन जब यकिन हुआ तो मन में सौ सवाल एक साथ घुमरने लगे...क्या सच में कौवा ही कौवा का मांस खाता है...घर के बड़े बुजुर्गों से पूछा...ईया...(दादी) ने बताया की ये कहावत बरसों से चली आ रही है...पहले कौवा उस एक ख़ास विरादरी के लिए संबोधन होता था जो अपने ही बिरादरी के खिलाफ षडयंत्र करता...अब भी वो विरादरी है...अभी भी कौवा है...लेकिन संबोधन के नाम पर एक नई जाति के लिए ये जुमला इस्तमाल होने लगा है...अमर सिंह ने खुल कर तो नहीं बताया की वो जाति कौन है जिसे कौवा कहा जा रहा है...लेकिन उनके करीबी लोगों ने नए कौवा का किरदार पत्रकारों के जाति से कराया है...
           एक दिन देश के एक अग्रणी चैनल पर दफ्तर से गुजरते नज़रे टिक गई...देखा तो होश उड़ गए...जो दिखाया जा रहा था वो बड़ा असहज है...अपने ही बिरादरी अपने ही जाति और अपने ही भाई बहनों के कपड़े उतारे जा रहे थे...दुर्भाग्य से उस समाज और उस बिरादरी का हिस्सा मै भी हूं...तकलीफ हुई...लेकिन फिर शांत हो गया क्योकि अचानक अमर सिंह का बाईट याद आ गया .....कौवा...कौवा का मांस खाता है....