खबरे ख़ास हो...खबरें आम हो...और ख़बरे उन ख़बरनवीसों की हो तो दुकान सज गयी है...संसद के भीतर और संसद के बाहर भी...संसद के भीतर सजायी है...देश के कोने कोने से आये राजनीति करने वालों ने...और बाहर जिनकी दुकान लगी है वो उन लोगों की है जो ख़बरे दिखाते है...खबरे बनाते है और खुद कभी कभी ख़बर बन जाते है...रोज जाता हूं...इस चौक के रंग में रंगने की कोशिशे भी करता है...
Wednesday, 3 August 2011
Thursday, 7 July 2011
कौवा....कौवा का मांस खाता है..........
एक दिन देश के एक अग्रणी चैनल पर दफ्तर से गुजरते नज़रे टिक गई...देखा तो होश उड़ गए...जो दिखाया जा रहा था वो बड़ा असहज है...अपने ही बिरादरी अपने ही जाति और अपने ही भाई बहनों के कपड़े उतारे जा रहे थे...दुर्भाग्य से उस समाज और उस बिरादरी का हिस्सा मै भी हूं...तकलीफ हुई...लेकिन फिर शांत हो गया क्योकि अचानक अमर सिंह का बाईट याद आ गया .....कौवा...कौवा का मांस खाता है....
Sunday, 2 January 2011
पाकिस्तान को २७ हजार टन मांस का निर्यात
हमें गर्व है कि हम भारत के नागरिक हैं। उस भारत के जो करूणा और दया का देश है। अहिंसा जिसकी पहचान है। विश्व में केवल भारत ने ही जियो और जीने का संदेश दिया है। हर वर्ष जब पर्यूषण का पर्व आता है, तो इस बात की याद दिलाता है कि हम प्रकृति की गोद में खेलते इन सहस्त्र बिन बोले प्राणियों की रक्षा करें। लेकिन हमारे देश की सरकार क्या करती है, इस बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं। हमारे नगर और मोहल्ले अब लगभग बूच़ड खाने बन चुके हैं। पिछले दिनों मुंबई महानगर के कोकण तट पर दो जहाजों की भिंडत से समुद्र में तेल ही तेल फैल गया। कितनी मछलियां मरी और कितने समुद्री जीवों ने अपने प्राण त्याग दिये इसका कोई हिसाब नहीं है। केवल हम यह कह सकते हैं कि कछुवे से लगा का झींगे तक अब एक साल हमारे समुद्री तट पर दिखलाई नहीं प़डेंगे । मछलियों का व्यापार ठप्प हो गया। आपदा प्रबंधन की बात करने वाली सरकार समुद्र के इन जीवन जंतुओं को मरने से नहीं रोक सकी। मछलियों के अंडे प्रायः समाप्त हो गए, इसकी कमी कितने समय तक खलेगी कोई निष्णांत ही बतला सकता है। उक्त दुर्घटना तो मानव की भूल के कारण हो गई, लेकिन उन हत्याओं का क्या जो इंसान जानबूझ कर करता है। भारत में ३० प्रतिशत जनता बहुत ही सख्ती से पालन करने वाले शाकाहारी है। २५ प्रतिशत बहुत कम अवसरों पर मांसाहार करते हैं। अन्य ४५ प्रतिशत मिले जुले रूप से मांसाहार और शाकाहार दोनों का उपयोग करते हैं। एक समय था भारत में ६८ प्रतिशत शुद्ध शाकाहारी थे, लेकिन अब वह समय चला गया है। देशी रियासतों में १०६ दिन पशु नहीं कटते थे, लेकिन अब तो पर्यूषण और रामनवमी के अवसर पर भी बाजार में जिसका चाहो मांस उपलब्ध हो जाता है। यहां तक भी बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन क्या आप जानते हैं भारत सरकार अपने यहां के पशुओं का मांस हमारे प़डोसी देश पाकिस्तान को भी निर्यात करने से नहीं चूकती। पाकिस्तान वह प़डोसी देश है, जो हमारे पर हमले करता है। आतंकवाद को भारत में प्रायोजित करता है। भारत से दुश्मनी निकलाने के लिये वह कभी संसद पर हमला करवाता है, तो कभी मुंबई की ताज पर। पाकिस्तान वह सब कुछ करने के लिये तैयार रहता है, जिससे भारत में सेंध लगती रहे। लेकिन एक हम भारतीय हैं कि पाकिस्तान के हर अपराध को क्षमा कर देते हैं। महात्मा जी ने तो ५५ कऱोड रुपये ही दिलाए, लेकिन जवाहरलाल जी ने कश्मीर का एक ब़डा भूभाग ही उसके हवाले कर दिया । शायद ही कोई दिन जाता होगा, जब हम पाकिस्तान के अत्याचारों को नहीं सहते होंगे। भारत की जो आज कमजोर स्थिति है, वह केवल पाकिस्तान को सरकार द्वारा हर क्षेत्र में दी जाने वाली सहायता की आभारी है। भारत के लोग भूखे मरे, लेकिन पाकिस्तान को हम आलू, शक्कर, प्याज और मनचाहा अनाज भी देने में पीछे नहीं रहते।
दुनिया के धनी देश भारत को सबसे ब़डा मांस निर्यात करने वाला देश बनाने में जुटे हुए हैं। भारत के कृषि मंत्री इसका दावा करते हैं कि अन्य वस्तु तो उगाना प़डती है। उसको तैयार करने में खर्च आता है। अनेक वस्तुओं के लिये कच्चे माल की आवश्यकता प़डती है, लेकिन मांस एक ऐसा व्यापार है... जिसमें हमारा कुछ भी खर्च नहीं होता है। उसे बूच़डखाने में भेजने की देर है, बस फिर तो डॉलर, यूरो और रुपयों से आपकी झोली भर जाएगी। क्योंकि पशु का केवल मांस ही नहीं बिकता है, बल्कि उसकी खाल, बाल, हड्डियां, आतें खुर तथा सींग और चर्बी सभी बाजार में ऊंचे दामों पर बिकते हैं। मुंबई के एक ब़डे मांस के निर्यातक ने इस लेखक को कहा था कि तुम नहीं जानते हो भारत के पशु भारत के लिये पेट्रोल का कुआं है। जब चाहो उसका उपयोग करो। भारत सरकार उनके चरण चिह्नों पर चल रही है। वह ध़डल्ले से मांस का निर्यात करती है और अपनी तिजोरी को पैसों से छलका देती है। भारत सरकार इस मामले में इतनी बेशर्म है कि वह अपने शत्रु पाकिस्तान की जीभ पर भी भारतीय पशुआें का स्वादिष्ट मांस रखने से नहीं चूकती है। इस समय दुनिया के २० ऐसे देश हैं, जिन्हें वह नियमितता से मांस की पूर्ति करती है। इनमें पाकिस्तान का नाम भी शामिल है। सरकारी आंक़डेे बतलाते हैं कि २००६०७ में भारत ने पाकिस्तान को २५,६०६३८ मैट्रिक टन, ०७०८ में ९,९४७ ६८ मैट्रिक टन और ०८०९ में २७८९३७ मैट्रिक टन मांस की पूर्ति की थी। इसके बदले में भारत सरकार को क्रमशः १३,३०९६३,६१२५५८ और १,७४३५३ लाख रुपये की आय हुई। संक्षेप में कहा जाए तो २७३४३३८ टन के बदले भारत सरकार को २१,१७८९३ लाख की कमाई हुई। भारत सरकार के लिये तो विचार करने का अवसर ही नहीं है, लेकिन भारत की जागरूक जनता को इस पर विचार करना चाहिये कि कितने सस्ते दामों में हमारा पशु धन हमारे शत्रु देश का भोजन बन रहा है।
भारत से मांस को निर्यात किये जाने वाले आंक़डों पर जब विचार किया जाता है, तो ऐसा महसूस होता है कि भारत दुनिया का अव्वल नम्बर का कसाई बन गया है। जिस देश में इतनी हिंसा फैलेगी तो फिर वहां आतंकवाद नहीं पनपेगा तो और क्या होगा। भारत सरकार अपनी भावी प़ीढी को क्या संदेश दे रही है, इससे स्पष्ट पता चल जाता है।
संयुक्त अरब अमीरात एक ऐसा देश है, जिसे सबसे अधिक मांस का निर्यात पिछले तीन वर्षो में किया गया है। ०६ में २९८९० मैट्रिक टन, ०७ में २६,२१२ और ०८ में १५६४८ मैट्रिक टन मांस का निर्यात किया था। इससे भारत को कुल ५८,३६१ लाख की कमाई हुई थी। भारत से मांस खरीदने वाले प्रमुख देश है इजिप्ट, मलेशिया, कुवैत, सऊदी अरब, अमीरात जोर्डन, ईरान, ओमान, लेबनान, पाकिस्तान और अजरबेजान मुस्लिम राष्ट्र है। जबकि वियेतनाम, फिलिपाइंस, अंगोला, जोर्जिया,सेनेगल, बेगन,घाना और आइववरी कोस्ट गैर मुस्लिम राष्ट्र हैं। इतना ही नहीं, भारत में जब किसी भी अन्य देश से मांस का ऑर्डर मिलता है, तो चाहे वह पश्चिम का ही देश हो भारत अपने पशुओं का कत्ल करके उनके मांस को निर्यात करने के लिये उतावला रहता है। भारत सरकार इसे विदेशी मुद्रा के लिये आवश्यक मानती है, लेकिन क्या किसी का रक्त और किसी का मांस बेचकर दुनिया का भला किया जा सकता है। यदि यही आवश्यक है, तो फिर इंसान के रक्त का व्यापार सरकार क्यों शुरू नहीं कर देती ?
भारत से विदेशों को जाने वाला मांस भैंसों का अधिक होता है, लेकिन मांस के दलालों का कहना है कि भारतीय पशु जंगल में चरता और उछेरा जाता है। इसलिए उसका मांस अधिक पौष्टिक और स्वदिष्ट होता है। इनमें केवल भैंस का ही नहीं, बल्कि गाय और बैल का मांस भी शामिल है। बकरे और भैंस के मांस की भी बहुत ब़डी मांग है। इकोनोमिक टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार सरकार की अदूरदर्शी नीतियों से मांस की मांग में भारी वृद्धि हुई है। नई दिल्ली स्थित डेयरी के अधिकारी ने बतलाया कि अप्रैल ०८ ये ०९ के बीच भैंस के मांस निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में ४५ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जब चारा और अन्य वस्तु महंगी होती है, तो भैंस का मालिक उसे सीधे कत्लखाने भेज देता है। लेकिन दिल्ली पशु विश्वविद्यालय के डॉक्टर विनोद कुमार ने इस संबंध में लम्बी खोज के बाद कुछ चमत्कार किये हैं। मेरठ के पास उनका एक फोर्म हाउस है, जहां वे उन भैंसों को खरीद कर ले आते हैं, जो समय पर ब्यहती नहीं है। जो किसान दो तीन हजार रुपये में भैंस बेचने को तैयार हो जाते हैं, वे उनको दस हजार तक का मूल्य दे देते हैं। उक्त भैंस पुनः ब्याह कर दूध देना शुरू कर देती है। लेकिन सवाल है इस प्रकार के कितने डॉक्टर विनोद कुमार देश में हैं ?
दुख की बात तो यह कि इन भैंसों को मांस के लिये काटने पर भारत सरकार अनुदान देती है। जिसका सीधा प्रभाव दूध की खपत पर प़डता है। हरियाणा की मुर्रा भैंस दूध के मामले में विश्व विख्यात है। पिछले दिनों उस पर चीन की नजरे प़डी। वे इसे यहां से तस्करी द्वारा ले गए। अब चीन में उन पर नए प्रयोग हो रहे हैं। वे भी डॉक्टर विनोद कुमार के मार्ग पर अग्रसर हैं। चीन का मानना है कि भारतीयों के घरों में घुसना है, तो उन्हें सस्ते दूध की पूर्ति करो। यदि हमारी भैंसे मांसाहरियों का कौर बनती रही तब तो कृष्ण के इस देश को दूध की खोज किसी बीजिंग में जा करना प़डेगी। दी केटल साइट लेटेस्ट न्यूज पर १७ दिसंबर ०८ को जारी समाचार में यह मांग की गई है कि भारत गौमांस का उत्पादन ब़ढाए। उसकी भविष्यवाणी है कि गौमांस के निर्यात में भारत को अनिवार्य रूप से प्रतिवर्ष ५ प्रतिशत दर की वृद्धि करनी प़डेगी। फिलहाल भारत का नंबर मांस के निर्यात के लिये तीसरा है, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया दूसरे और पहले नंबर पर है।
महान उडिया लेखक पतरी जब न्यूयार्क की यात्रा पर गए तो उन्होंने राष्ट्रसंघ के विशाल भवन की भी मुलाकात ली। उन्होंने इस विशाल भवन को अपनी एक मार्गदर्शिका के माध्यम से लगातार तीन दिन तक देखा। चौथे दिन उस ल़डकी से जो एक यहूदी बिटया थी, उससे पूछा हर वर्ष सारी दुनिया राष्ट्रसंघ के माध्यम से कऱोडों डॉलर की सहायता गरीब देशों को देती है। फिर भी ऐसा क्या कारण है कि दुनिया का उत्थान नहीं होता ? तब उस ल़डकी ने कहा महोदय आज जहां राष्ट्रसंघ का भवन है, वहां किसी समय न्यूयार्क का सबसे ब़डा बूच़डखाना था?
आभार...स्वतंत्र वार्ता
दुनिया के धनी देश भारत को सबसे ब़डा मांस निर्यात करने वाला देश बनाने में जुटे हुए हैं। भारत के कृषि मंत्री इसका दावा करते हैं कि अन्य वस्तु तो उगाना प़डती है। उसको तैयार करने में खर्च आता है। अनेक वस्तुओं के लिये कच्चे माल की आवश्यकता प़डती है, लेकिन मांस एक ऐसा व्यापार है... जिसमें हमारा कुछ भी खर्च नहीं होता है। उसे बूच़डखाने में भेजने की देर है, बस फिर तो डॉलर, यूरो और रुपयों से आपकी झोली भर जाएगी। क्योंकि पशु का केवल मांस ही नहीं बिकता है, बल्कि उसकी खाल, बाल, हड्डियां, आतें खुर तथा सींग और चर्बी सभी बाजार में ऊंचे दामों पर बिकते हैं। मुंबई के एक ब़डे मांस के निर्यातक ने इस लेखक को कहा था कि तुम नहीं जानते हो भारत के पशु भारत के लिये पेट्रोल का कुआं है। जब चाहो उसका उपयोग करो। भारत सरकार उनके चरण चिह्नों पर चल रही है। वह ध़डल्ले से मांस का निर्यात करती है और अपनी तिजोरी को पैसों से छलका देती है। भारत सरकार इस मामले में इतनी बेशर्म है कि वह अपने शत्रु पाकिस्तान की जीभ पर भी भारतीय पशुआें का स्वादिष्ट मांस रखने से नहीं चूकती है। इस समय दुनिया के २० ऐसे देश हैं, जिन्हें वह नियमितता से मांस की पूर्ति करती है। इनमें पाकिस्तान का नाम भी शामिल है। सरकारी आंक़डेे बतलाते हैं कि २००६०७ में भारत ने पाकिस्तान को २५,६०६३८ मैट्रिक टन, ०७०८ में ९,९४७ ६८ मैट्रिक टन और ०८०९ में २७८९३७ मैट्रिक टन मांस की पूर्ति की थी। इसके बदले में भारत सरकार को क्रमशः १३,३०९६३,६१२५५८ और १,७४३५३ लाख रुपये की आय हुई। संक्षेप में कहा जाए तो २७३४३३८ टन के बदले भारत सरकार को २१,१७८९३ लाख की कमाई हुई। भारत सरकार के लिये तो विचार करने का अवसर ही नहीं है, लेकिन भारत की जागरूक जनता को इस पर विचार करना चाहिये कि कितने सस्ते दामों में हमारा पशु धन हमारे शत्रु देश का भोजन बन रहा है।
भारत से मांस को निर्यात किये जाने वाले आंक़डों पर जब विचार किया जाता है, तो ऐसा महसूस होता है कि भारत दुनिया का अव्वल नम्बर का कसाई बन गया है। जिस देश में इतनी हिंसा फैलेगी तो फिर वहां आतंकवाद नहीं पनपेगा तो और क्या होगा। भारत सरकार अपनी भावी प़ीढी को क्या संदेश दे रही है, इससे स्पष्ट पता चल जाता है।
संयुक्त अरब अमीरात एक ऐसा देश है, जिसे सबसे अधिक मांस का निर्यात पिछले तीन वर्षो में किया गया है। ०६ में २९८९० मैट्रिक टन, ०७ में २६,२१२ और ०८ में १५६४८ मैट्रिक टन मांस का निर्यात किया था। इससे भारत को कुल ५८,३६१ लाख की कमाई हुई थी। भारत से मांस खरीदने वाले प्रमुख देश है इजिप्ट, मलेशिया, कुवैत, सऊदी अरब, अमीरात जोर्डन, ईरान, ओमान, लेबनान, पाकिस्तान और अजरबेजान मुस्लिम राष्ट्र है। जबकि वियेतनाम, फिलिपाइंस, अंगोला, जोर्जिया,सेनेगल, बेगन,घाना और आइववरी कोस्ट गैर मुस्लिम राष्ट्र हैं। इतना ही नहीं, भारत में जब किसी भी अन्य देश से मांस का ऑर्डर मिलता है, तो चाहे वह पश्चिम का ही देश हो भारत अपने पशुओं का कत्ल करके उनके मांस को निर्यात करने के लिये उतावला रहता है। भारत सरकार इसे विदेशी मुद्रा के लिये आवश्यक मानती है, लेकिन क्या किसी का रक्त और किसी का मांस बेचकर दुनिया का भला किया जा सकता है। यदि यही आवश्यक है, तो फिर इंसान के रक्त का व्यापार सरकार क्यों शुरू नहीं कर देती ?
भारत से विदेशों को जाने वाला मांस भैंसों का अधिक होता है, लेकिन मांस के दलालों का कहना है कि भारतीय पशु जंगल में चरता और उछेरा जाता है। इसलिए उसका मांस अधिक पौष्टिक और स्वदिष्ट होता है। इनमें केवल भैंस का ही नहीं, बल्कि गाय और बैल का मांस भी शामिल है। बकरे और भैंस के मांस की भी बहुत ब़डी मांग है। इकोनोमिक टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार सरकार की अदूरदर्शी नीतियों से मांस की मांग में भारी वृद्धि हुई है। नई दिल्ली स्थित डेयरी के अधिकारी ने बतलाया कि अप्रैल ०८ ये ०९ के बीच भैंस के मांस निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में ४५ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जब चारा और अन्य वस्तु महंगी होती है, तो भैंस का मालिक उसे सीधे कत्लखाने भेज देता है। लेकिन दिल्ली पशु विश्वविद्यालय के डॉक्टर विनोद कुमार ने इस संबंध में लम्बी खोज के बाद कुछ चमत्कार किये हैं। मेरठ के पास उनका एक फोर्म हाउस है, जहां वे उन भैंसों को खरीद कर ले आते हैं, जो समय पर ब्यहती नहीं है। जो किसान दो तीन हजार रुपये में भैंस बेचने को तैयार हो जाते हैं, वे उनको दस हजार तक का मूल्य दे देते हैं। उक्त भैंस पुनः ब्याह कर दूध देना शुरू कर देती है। लेकिन सवाल है इस प्रकार के कितने डॉक्टर विनोद कुमार देश में हैं ?
दुख की बात तो यह कि इन भैंसों को मांस के लिये काटने पर भारत सरकार अनुदान देती है। जिसका सीधा प्रभाव दूध की खपत पर प़डता है। हरियाणा की मुर्रा भैंस दूध के मामले में विश्व विख्यात है। पिछले दिनों उस पर चीन की नजरे प़डी। वे इसे यहां से तस्करी द्वारा ले गए। अब चीन में उन पर नए प्रयोग हो रहे हैं। वे भी डॉक्टर विनोद कुमार के मार्ग पर अग्रसर हैं। चीन का मानना है कि भारतीयों के घरों में घुसना है, तो उन्हें सस्ते दूध की पूर्ति करो। यदि हमारी भैंसे मांसाहरियों का कौर बनती रही तब तो कृष्ण के इस देश को दूध की खोज किसी बीजिंग में जा करना प़डेगी। दी केटल साइट लेटेस्ट न्यूज पर १७ दिसंबर ०८ को जारी समाचार में यह मांग की गई है कि भारत गौमांस का उत्पादन ब़ढाए। उसकी भविष्यवाणी है कि गौमांस के निर्यात में भारत को अनिवार्य रूप से प्रतिवर्ष ५ प्रतिशत दर की वृद्धि करनी प़डेगी। फिलहाल भारत का नंबर मांस के निर्यात के लिये तीसरा है, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया दूसरे और पहले नंबर पर है।
महान उडिया लेखक पतरी जब न्यूयार्क की यात्रा पर गए तो उन्होंने राष्ट्रसंघ के विशाल भवन की भी मुलाकात ली। उन्होंने इस विशाल भवन को अपनी एक मार्गदर्शिका के माध्यम से लगातार तीन दिन तक देखा। चौथे दिन उस ल़डकी से जो एक यहूदी बिटया थी, उससे पूछा हर वर्ष सारी दुनिया राष्ट्रसंघ के माध्यम से कऱोडों डॉलर की सहायता गरीब देशों को देती है। फिर भी ऐसा क्या कारण है कि दुनिया का उत्थान नहीं होता ? तब उस ल़डकी ने कहा महोदय आज जहां राष्ट्रसंघ का भवन है, वहां किसी समय न्यूयार्क का सबसे ब़डा बूच़डखाना था?
आभार...स्वतंत्र वार्ता
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