मिडिया के पंद्रह साल एक अंजान सफर की तरह था....
Thursday, 13 May 2010
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ये कहानी हमारी नहीं उस बिरादरी कि है जिनके कंधे दूसरों के दर्द दिखाते और लिखते झुकते जा रहे है...ये कहानी उन लोगों की है जो समाज और परिवार की दहलिजों को पार करके हमेशा कुछ नया करने की सोचते है...इस कहानी में उस व्यवस्था का विरोध है जिसके कारण आमलोग परेशान रहते है...इस ब्लॉग का मकसद उस हमिदन के लिए है जो जरूरतमंद लोगों के लाईन में अंतिम पायदान पर खड़ी है...मै प्रकाश हूं...प्रकाश पीयूष हूं...पत्रकार हूं...उस व्यवस्था में खड़ा हूं...जहां बोलने से लोग नाराज़ हो जाते है..